रास्ते ढूंढते किन रास्तों में चले आए
रास्ते ढूंढते किन रास्तों में चले आए,
जंगलों से, शहरों से, धूँए भरी राहों से,
कहीं नाम-ओ-निशान नहीं मेरे रास्तों का..
इन रास्तों पर। फिर भी हताश नहीं..
शायद अगला मोड़ मेरा ही हो रस्ता..
जाने कहीं कुछ मिल ही जाये.. जाने!
मुमकिन कि कोई रस्ता अपना नहीं...
हाँ, मुमकिन.. मगर थोड़ा ही मुमकिन!
चलना यूँ ही पैदल-पैदल नंगे पांव..
हर गुज़रे रस्ते को महसूस करते हुए,
उसके कांटों और उसके फूलों को...
अपनी राहों में मंजूर करते हुए!
-अम्बर
15/11/2024


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